भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र माना जाता है। संविधान के अनुसार सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं। लेकिन स्वतंत्रता के बाद से कुछ नीतियाँ ऐसी बनीं, जिन्होंने इस समानता को सवालों के घेरे में ला दिया।
1972 इस दृष्टि से एक अहम साल है। इसी समय भारत में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की स्थापना हुई और कुछ साल बाद राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ। इन दोनों संस्थाओं का सीधा संबंध मुस्लिम समाज से था और इनकी स्थापना ने यह बहस छेड़ दी कि क्या भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल एक समुदाय को विशेष दर्जा देना है?
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की स्थापना
1972 में लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का गठन हुआ।
- इसका उद्देश्य मुस्लिम समाज के व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों (शादी, तलाक़, उत्तराधिकार आदि) को शरीअत के अनुसार चलाना था।
- बोर्ड का कहना था कि मुस्लिम समाज अपने धार्मिक कानूनों के अनुसार जीवन जीना चाहता है और इसमें सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
लेकिन यहीं से विवाद शुरू हुआ।
विवाद क्यों?
- हिंदू समाज के लिए समान कानून
- 1955-56 में हिंदू कोड बिल लाकर हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन समाज पर एक समान विवाह और उत्तराधिकार कानून लागू कर दिए गए।
- यानी हिंदू समाज को सरकार ने नियंत्रित किया।
- 1955-56 में हिंदू कोड बिल लाकर हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन समाज पर एक समान विवाह और उत्तराधिकार कानून लागू कर दिए गए।
- मुस्लिम समाज को छूट
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जरिए मुस्लिम समाज को अपने धार्मिक कानून के अनुसार चलने की छूट मिल गई।
- इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू समाज पर राज्य का नियंत्रण, और मुस्लिम समाज पर धार्मिक नेताओं का नियंत्रण रहा।
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जरिए मुस्लिम समाज को अपने धार्मिक कानून के अनुसार चलने की छूट मिल गई।
- एक देश, दो कानून
- इसने “Uniform Civil Code (UCC)” की बहस को और तेज़ किया।
- सवाल उठा कि जब भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तो सबके लिए एक जैसे कानून क्यों नहीं?
- इसने “Uniform Civil Code (UCC)” की बहस को और तेज़ किया।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग
इसके बाद 1978 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) की स्थापना की।
- उद्देश्य: अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना।
- इनमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी समुदाय शामिल हुए।
- हिंदू समाज को इसमें कोई स्थान नहीं मिला।
समस्याएँ
- अल्पसंख्यक आयोग को विशेष बजट और अधिकार मिले।
- आयोग की गतिविधियों पर हर साल हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं।
- केवल अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएँ बनीं, जबकि हिंदू समाज की समान समस्याओं को अनदेखा किया गया।
आर्थिक असमानता
एक अनुमान के अनुसार, 1972 से अब तक अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक योजनाओं पर लाखों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
- छात्रवृत्तियाँ, रोजगार योजनाएँ, विशेष पैकेज – ये सब मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए बने।
- जबकि हिंदू गरीबों के लिए अलग से कोई ऐसी व्यवस्था नहीं।
- हिंदू गरीब भी वही कर चुकाता है जिससे यह योजनाएँ चलती हैं, लेकिन लाभ मुख्यतः अल्पसंख्यक समुदाय को मिलता है।
सामाजिक असर
- विभाजन की राजनीति
- एक समुदाय को विशेष योजनाएँ देना समाज में असंतोष और असमानता की भावना बढ़ाता है।
- इससे हिंदू समाज में यह सोच गहरी हुई कि सरकार तुष्टिकरण करती है।
- एक समुदाय को विशेष योजनाएँ देना समाज में असंतोष और असमानता की भावना बढ़ाता है।
- कानूनी असमानता
- हिंदू समाज को विवाह, तलाक़ और संपत्ति मामलों में आधुनिक कानून मानने पड़े।
- मुस्लिम समाज अपने धार्मिक कानूनों पर चलता रहा।
- हिंदू समाज को विवाह, तलाक़ और संपत्ति मामलों में आधुनिक कानून मानने पड़े।
- राजनीतिक लाभ
- इन संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक दलों ने वोट बैंक बनाने के लिए किया।
- “मुस्लिम तुष्टिकरण” राजनीति का स्थायी हिस्सा बन गया।
- इन संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक दलों ने वोट बैंक बनाने के लिए किया।

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की बहस
संविधान के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट लिखा है कि राज्य को एक समान नागरिक संहिता लागू करनी चाहिए।
- यानी शादी, तलाक़, उत्तराधिकार, गोद लेना – सबके लिए एक जैसा कानून होना चाहिए।
- लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की मौजूदगी ने इसे रोक दिया।
👉 हिंदू समाज में सवाल उठा कि अगर उन्हें समान कानूनों का पालन करना है तो मुस्लिम समाज को क्यों नहीं?
आज की स्थिति
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आज भी मौजूद है और कई बार तीन तलाक़, निकाह हलाला, और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट से टकराव में आया।
- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग आज भी काम कर रहा है और अल्पसंख्यकों के लिए विशेष योजनाएँ चला रहा है।
निष्कर्ष
1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना और उसके बाद अल्पसंख्यक आयोग का गठन भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
- एक ओर हिंदू समाज पर समान कानून लागू कर दिए गए।
- दूसरी ओर मुस्लिम समाज को धार्मिक कानूनों के तहत छूट दी गई।
- साथ ही अल्पसंख्यकों के लिए विशेष आयोग और बजट बनाए गए।
यह न केवल संवैधानिक समानता (Article 14 और 15) के खिलाफ है, बल्कि समाज में असंतोष और विभाजन की जड़ भी है।
भारत की असली धर्मनिरपेक्षता तभी होगी जब –
- सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होगा।
- सरकारी योजनाएँ धर्म नहीं बल्कि गरीबी और जरूरत के आधार पर होंगी।
- तुष्टिकरण की राजनीति बंद होगी।
✍️ लेखक: अशोक खत्री
प्रधान, सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल












Leave a Reply