भारत एक ऐसा देश है जिसकी मिट्टी में हजारों वर्षों की सभ्यता और धार्मिक परंपराएँ रची-बसी हैं। यहाँ के मंदिर न केवल पूजा के स्थल रहे, बल्कि कला, संस्कृति, शिक्षा और समाज के केंद्र भी रहे। लेकिन विदेशी आक्रांताओं—विशेषकर मुग़लों और तुर्क आक्रांताओं—ने इन मंदिरों को बार-बार निशाना बनाया।
हजारों मंदिर तोड़े गए, उन पर मस्जिदें और मकबरे बनाए गए। यह केवल धर्मस्थल का विनाश नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति और पहचान पर हमला था।
आजादी के बाद उम्मीद थी कि हिंदू समाज को न्याय मिलेगा और उन धरोहरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा। लेकिन 1991 में पारित एक कानून ने यह रास्ता ही बंद कर दिया। यह था—Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991।
Places of Worship Act, 1991 क्या है?
यह कानून 1991 में नरसिम्हा राव सरकार के दौरान पारित किया गया। इसके मुख्य प्रावधान थे:
- धार्मिक स्थल की स्थिति 15 अगस्त 1947 जैसी रहेगी।
- यानी जो मंदिर 1947 से पहले मस्जिद, दरगाह या अन्य ढाँचे में बदल दिए गए, उनकी स्थिति वैसी ही मानी जाएगी।
- उन्हें पुनः मंदिर बनाने की मांग अदालत में नहीं की जा सकती।
- यानी जो मंदिर 1947 से पहले मस्जिद, दरगाह या अन्य ढाँचे में बदल दिए गए, उनकी स्थिति वैसी ही मानी जाएगी।
- किसी भी धार्मिक स्थल को बदलने पर रोक।
- कोई मंदिर मस्जिद में या मस्जिद मंदिर में नहीं बदली जा सकती।
- कोई मंदिर मस्जिद में या मस्जिद मंदिर में नहीं बदली जा सकती।
- एकमात्र अपवाद: अयोध्या।
- राम जन्मभूमि विवाद को इस कानून से बाहर रखा गया।
- राम जन्मभूमि विवाद को इस कानून से बाहर रखा गया।
हिंदू समाज के लिए अन्याय
यह कानून पहली नज़र में “धर्मनिरपेक्ष” और “शांति बनाए रखने वाला” लगता है। लेकिन गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह विशेष रूप से हिंदू समाज के साथ अन्याय करता है।
- मंदिरों की पुनर्स्थापना असंभव बना दी गई
- काशी विश्वनाथ, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे स्थलों पर हिंदू समाज के पास ठोस प्रमाण हैं कि वहाँ मंदिर थे जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई।
- लेकिन इस कानून ने कह दिया कि अब यह स्थिति बदली नहीं जा सकती।
- काशी विश्वनाथ, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे स्थलों पर हिंदू समाज के पास ठोस प्रमाण हैं कि वहाँ मंदिर थे जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई।
- इतिहास के घाव पर परदा डालना
- यह कानून मानो यह कहता है कि मुग़लकाल और उसके अत्याचारों को भूल जाओ।
- लेकिन क्या अन्याय को भूल जाना ही न्याय है?
- यह कानून मानो यह कहता है कि मुग़लकाल और उसके अत्याचारों को भूल जाओ।
- हिंदुओं के अधिकार छीनना
- अगर एक समुदाय के पवित्र स्थल तोड़कर दूसरे ढाँचे में बदले गए, तो मूल समुदाय को पुनः उनका अधिकार मिलना चाहिए।
- लेकिन इस कानून ने हिंदुओं को अदालत जाने तक से रोक दिया।
- अगर एक समुदाय के पवित्र स्थल तोड़कर दूसरे ढाँचे में बदले गए, तो मूल समुदाय को पुनः उनका अधिकार मिलना चाहिए।
मुस्लिम और क्रिश्चियन स्थलों पर असर क्यों नहीं?
- भारत में किसी मस्जिद को मंदिर में नहीं बदला गया।
- किसी चर्च को मंदिर में नहीं बदला गया।
- बदलाव केवल एक दिशा में हुआ – मंदिर → मस्जिद/मकबरा।
- इसलिए यह कानून सबसे ज्यादा हिंदू समाज के खिलाफ गया।
ऐतिहासिक उदाहरण
- काशी विश्वनाथ मंदिर
- 1669 में औरंगज़ेब ने इस मंदिर को तोड़ा और ज्ञानवापी मस्जिद बनाई।
- आज भी मंदिर के अवशेष वहाँ मौजूद हैं।
- लेकिन 1991 का कानून कहता है कि इसे बदला नहीं जा सकता।
- 1669 में औरंगज़ेब ने इस मंदिर को तोड़ा और ज्ञानवापी मस्जिद बनाई।
- मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि
- यहाँ भी मंदिर तोड़कर शाही ईदगाह मस्जिद बनाई गई।
- हिंदू समाज की भावनाएँ आज भी आहत हैं।
- यहाँ भी मंदिर तोड़कर शाही ईदगाह मस्जिद बनाई गई।
- हजारों छोटे मंदिर
- राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत में कई मंदिरों को मस्जिदों में बदला गया।
- लेकिन 1991 का कानून उन्हें वापस करने की इजाज़त नहीं देता।
- राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत में कई मंदिरों को मस्जिदों में बदला गया।
संवैधानिक सवाल
- Article 25 और 26
- संविधान हर धर्म को पूजा-पद्धति और धार्मिक स्थलों पर अधिकार देता है।
- लेकिन हिंदू समाज को अपने ही तोड़े गए मंदिरों पर अधिकार नहीं दिया गया।
- संविधान हर धर्म को पूजा-पद्धति और धार्मिक स्थलों पर अधिकार देता है।
- Article 14 – समानता का अधिकार
- जब अल्पसंख्यक अपने धार्मिक स्थल और पहचान बचा सकते हैं, तो हिंदू क्यों नहीं?
- जब अल्पसंख्यक अपने धार्मिक स्थल और पहचान बचा सकते हैं, तो हिंदू क्यों नहीं?
- न्यायपालिका से दूरी
- यह कानून अदालत में जाने तक से रोकता है।
- यानी न्याय की बुनियादी राह ही बंद कर दी गई।
- यह कानून अदालत में जाने तक से रोकता है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
- 1991 में देश आर्थिक संकट और सांप्रदायिक तनाव से जूझ रहा था।
- सरकार को लगा कि अगर मंदिर-मस्जिद विवाद उठेगा तो देश में दंगे हो सकते हैं।
- इसलिए यह कानून बनाया गया।
- लेकिन वास्तविकता में यह हिंदू समाज के अधिकारों को बलि चढ़ाने जैसा था।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य
- राम जन्मभूमि फैसला (2019)
- अयोध्या केस को इस कानून से बाहर रखा गया था।
- सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू समाज के पक्ष में फैसला दिया।
- इसने साबित किया कि इतिहास का अन्याय सुधारा जा सकता है।
- अयोध्या केस को इस कानून से बाहर रखा गया था।
- काशी और मथुरा मुकदमे
- हाल के वर्षों में काशी ज्ञानवापी और मथुरा ईदगाह मामलों में अदालतें सुनवाई कर रही हैं।
- यह सवाल उठ रहा है कि क्या Places of Worship Act पर पुनर्विचार होना चाहिए।
- हाल के वर्षों में काशी ज्ञानवापी और मथुरा ईदगाह मामलों में अदालतें सुनवाई कर रही हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
- कई याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून असंवैधानिक है क्योंकि यह न्याय पाने के अधिकार को रोकता है।
- कई याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून असंवैधानिक है क्योंकि यह न्याय पाने के अधिकार को रोकता है।

हिंदू समाज की मांग
- इतिहास के घावों पर न्याय होना चाहिए।
- जो मंदिर तोड़े गए और सबूत मौजूद हैं, उन्हें पुनः स्थापित किया जाना चाहिए।
- Places of Worship Act, 1991 की समीक्षा होनी चाहिए।
निष्कर्ष
1991 का Places of Worship Act शांति और समानता के नाम पर लाया गया था। लेकिन असलियत में यह हिंदू समाज के साथ भेदभाव है।
- इसने उन मंदिरों के पुनर्निर्माण पर रोक लगा दी जिन्हें आक्रांताओं ने तोड़ा था।
- यह हिंदू समाज की ऐतिहासिक पीड़ा को और गहरा करता है।
- न्याय का रास्ता बंद करना किसी समस्या का समाधान नहीं है।
👉 समय आ गया है कि इस कानून की समीक्षा हो और हिंदू समाज को उसका अधिकार वापस मिले।
✍️ लेखक: अशोक खत्री
प्रधान, सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल












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