भारत एक ऐसा देश है जिसकी पहचान उसकी सनातन परंपरा और मंदिर संस्कृति से होती है। यहाँ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और शिक्षा के केंद्र रहे हैं।
लेकिन आज़ादी के कुछ ही वर्षों बाद, 1951 और 1956 में लाए गए कानूनों और प्रावधानों ने हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण के अधीन कर दिया।
दुनिया में यह एक अनोखी स्थिति है कि जहाँ केवल बहुसंख्यक समाज के धार्मिक स्थलों पर सरकार का नियंत्रण है, लेकिन किसी मस्जिद या चर्च पर ऐसा नियंत्रण नहीं है।
1951: पहला कदम मंदिरों पर नियंत्रण का
आज़ादी के चार साल बाद 1951 में सरकार ने राज्य स्तर पर कानून बनाए जिनका उद्देश्य था:
- मंदिरों की आय और संपत्ति पर नियंत्रण करना।
- मंदिर प्रशासन को “पब्लिक ट्रस्ट” की तरह चलाना।
प्रभाव:
- हज़ारों मंदिरों का प्रबंधन सरकार के हाथ में चला गया।
- पुजारियों और सेवादारों की नियुक्ति तक सरकार करने लगी।
- मंदिरों की आय का उपयोग धार्मिक कार्यों के बजाय सरकारी योजनाओं में होने लगा।
👉 सवाल यह है कि अगर मंदिर “जनता की संपत्ति” हैं तो क्या मस्जिद और चर्च जनता की संपत्ति नहीं? क्यों वहाँ सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं?
1956: व्यापक नियंत्रण की शुरुआत
1956 में कई राज्यों ने मंदिर प्रबंधन के लिए विशेष अधिनियम बनाए।
उदाहरण:
- तमिलनाडु हिंदू रिलीजीयस एंड चैरिटेबल एंडाउमेंट्स (HR&CE) एक्ट 1956
- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी इसी तरह के कानून लागू हुए।
इन कानूनों के तहत:
- मंदिरों की आय और संपत्ति का सीधा नियंत्रण राज्य सरकारों को मिला।
- ट्रस्टियों और पुजारियों की नियुक्ति सरकार ने अपने हाथ में ले ली।
- मंदिरों की संपत्ति बेचने या उपयोग करने का अधिकार भी सरकार के पास आ गया।
आँकड़े और तथ्य
- भारत में लगभग 44 लाख छोटे-बड़े मंदिर और मठ हैं।
- इनमें से बड़ी संख्या राज्य सरकारों के HR&CE विभाग के अधीन है।
- इनमें से बड़ी संख्या राज्य सरकारों के HR&CE विभाग के अधीन है।
- केवल तमिलनाडु में ही:
- लगभग 44,000 मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं।
- इन मंदिरों की सालाना आय हज़ारों करोड़ रुपए है।
- लेकिन इस आय का बहुत बड़ा हिस्सा धार्मिक गतिविधियों के बजाय अन्य सरकारी योजनाओं में खर्च होता है।
- लगभग 44,000 मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं।
- कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में भी स्थिति यही है।
👉 यानी करोड़ों की संपत्ति और दान जो मंदिरों के धार्मिक कार्यों और समाज सेवा में लगना चाहिए था, वह सरकार के नियंत्रण में चला गया।
क्यों सिर्फ हिंदू मंदिर?
1. मस्जिद और चर्च को छूट
- भारत में किसी भी मस्जिद पर सरकार का नियंत्रण नहीं है।
- चर्च और मिशनरी संस्थाएँ पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
- उनके दान और आय पर सरकार का कोई अधिकार नहीं।
2. वक्फ बोर्ड का उदाहरण
- 1954 में वक्फ एक्ट लाया गया।
- इसके तहत मुसलमानों की संपत्ति और मस्जिदों को “वक्फ बोर्ड” के अधीन रखा गया।
- लेकिन यह बोर्ड भी मुस्लिम समाज द्वारा ही संचालित होता है, सरकार केवल निगरानी करती है।
👉 यानी मस्जिदें और चर्च अपने समुदाय के नियंत्रण में सुरक्षित हैं, लेकिन मंदिर पूरी तरह सरकार के अधीन।
समस्या की गहराई
1. आय का दुरुपयोग
मंदिरों की करोड़ों की आय:
- स्कूल, कॉलेज, अस्पताल या धर्मार्थ कार्यों में लगाने के बजाय सरकारी योजनाओं में उपयोग होती है।
- कई बार यह पैसा ऐसी योजनाओं में भी जाता है जिनका मंदिरों या हिंदू समाज से कोई संबंध नहीं होता।
2. परंपराओं में हस्तक्षेप
सरकार ने मंदिरों की परंपरागत व्यवस्थाओं को भी बदल दिया।
- पुजारियों की नियुक्ति योग्यता से नहीं, राजनीतिक दबाव से होने लगी।
- कई मंदिरों में पारंपरिक पूजा-पद्धति पर सवाल उठाए गए।
3. संपत्ति का ह्रास
कई मंदिरों की जमीन और संपत्ति बेची गई या अवैध कब्ज़े में चली गई।
👉 अनुमान है कि केवल तमिलनाडु में मंदिरों की 50,000 एकड़ से अधिक भूमि अवैध कब्ज़े में है।
4. धार्मिक असमानता
अगर सरकार सचमुच निष्पक्ष है, तो केवल हिंदू मंदिरों पर नियंत्रण क्यों?
क्या यह धर्मनिरपेक्षता है या भेदभाव?

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
मंदिरों का महत्व
प्राचीन भारत में मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे।
- वे शिक्षा के केंद्र थे।
- समाज सेवा और धर्मार्थ कार्य मंदिरों से ही संचालित होते थे।
- आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ मंदिरों से जुड़ी होती थीं।
ब्रिटिश काल में नियंत्रण
ब्रिटिश शासन ने सबसे पहले मंदिरों पर नियंत्रण किया।
- 19वीं शताब्दी में उन्होंने कई मंदिरों को अपने प्रशासन के अधीन कर लिया।
- दान और आय को कर के रूप में वसूल किया।
आज़ादी के बाद उम्मीद थी कि यह अन्याय खत्म होगा।
लेकिन दुर्भाग्य से, 1951 और 1956 में वही व्यवस्था और मजबूत हो गई।
समाज पर असर
- धार्मिक संस्थानों की कमजोरी
- मंदिर अपनी स्वतंत्रता और परंपरा से वंचित हो गए।
- समुदाय का विश्वास टूटने लगा।
- मंदिर अपनी स्वतंत्रता और परंपरा से वंचित हो गए।
- सांस्कृतिक पहचान पर असर
- नई पीढ़ी मंदिरों से दूर हो रही है क्योंकि मंदिर प्रशासन अब राजनीतिक और सरकारी नियंत्रण में है।
- नई पीढ़ी मंदिरों से दूर हो रही है क्योंकि मंदिर प्रशासन अब राजनीतिक और सरकारी नियंत्रण में है।
- असमानता का भाव
- हिंदू समाज महसूस करता है कि उनके धार्मिक स्थलों पर अन्याय हुआ है।
- जबकि अन्य धर्मों को पूरी स्वतंत्रता है।
- हिंदू समाज महसूस करता है कि उनके धार्मिक स्थलों पर अन्याय हुआ है।
हमारी माँगें
- मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए।
- मंदिरों की संपत्ति और आय का प्रबंधन हिंदू समाज और धार्मिक ट्रस्टों के हाथ में दिया जाए।
- अवैध कब्ज़ों को हटाकर मंदिरों की जमीन वापस दिलाई जाए।
- मंदिर प्रशासन पारदर्शी और स्वतंत्र बनाया जाए।
- धर्मनिरपेक्षता का मतलब “समानता” हो, न कि केवल हिंदू समाज पर नियंत्रण।
निष्कर्ष
1951 और 1956 में जो व्यवस्था लागू हुई, उसने केवल हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में डाल दिया।
आज भी देशभर में लाखों मंदिरों की संपत्ति और आय सरकार के अधीन है, जबकि मस्जिदें और चर्च अपने समुदायों के नियंत्रण में स्वतंत्र हैं।
सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल का मानना है कि यह व्यवस्था हिंदू समाज के साथ अन्याय है।
भारत का भविष्य तभी संतुलित और न्यायपूर्ण होगा जब मंदिरों को उनकी स्वतंत्रता वापस मिलेगी और सभी धार्मिक संस्थानों पर एक समान नियम लागू होंगे।
✍️ लेखक:
अशोक खत्री
प्रधान, सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल












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