सनातन धर्म रक्षा दल समिति कैथल हरियाणा (भारत )

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आर्टिकल 25 और हिंदू-सिख अधिकार: एक असमानता की गाथा

भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संविधान है। इसमें हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। यही अधिकार आर्टिकल 25 (Article 25 of the Indian Constitution) में दर्ज है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह स्वतंत्रता सभी धर्मों को समान रूप से दी गई है?
विशेषकर हिंदू और सिख समाज लंबे समय से महसूस कर रहे हैं कि इस अनुच्छेद में उनके साथ बराबरी का न्याय नहीं हुआ।


आर्टिकल 25 क्या कहता है?

संविधान का आर्टिकल 25 यह प्रावधान करता है कि:

“हर व्यक्ति को धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता होगी।”

यह सुनने में बिल्कुल न्यायपूर्ण और संतुलित लगता है। लेकिन इसके साथ जो जोड़ी गई है, वहीं से विवाद शुरू होता है।

इसमें कहा गया है कि —
👉 “हिंदू धर्म में सिख, जैन और बौद्ध धर्म भी शामिल माने जाएंगे।”


समस्या कहाँ है?

1. सिख, जैन और बौद्ध धर्म की स्वतंत्र पहचान का हनन

  • सिख धर्म की अपनी गुरुग्रंथ साहिब, अपने गुरु, और अलग परंपरा है।
  • जैन धर्म की अपनी दर्शन-परंपरा और तीर्थंकर हैं।
  • बौद्ध धर्म पूरी तरह से स्वतंत्र आस्था है।

फिर भी आर्टिकल 25 की व्याख्या में इन सभी को हिंदू धर्म के अंतर्गत रख दिया गया।
👉 इसका मतलब यह हुआ कि संवैधानिक स्तर पर सिख, जैन और बौद्ध धर्म को स्वतंत्र धार्मिक पहचान नहीं दी गई।

2. मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण

आर्टिकल 25 के तहत राज्य सरकारें हिंदू धार्मिक संस्थानों और मंदिरों के प्रशासन में हस्तक्षेप कर सकती हैं।
परिणाम:

  • लाखों मंदिरों की आय सरकार के पास जाती है।
  • जबकि चर्च और मस्जिद जैसी संस्थाएँ पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

3. धर्मांतरण पर सवाल

आर्टिकल 25 धर्म प्रचार और प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता देता है।
लेकिन इसी का फायदा उठाकर हिंदू और सिख समाज के बड़े हिस्से में धर्मांतरण हुआ।
👉 यानी हिंदुओं और सिखों के लिए यह अनुच्छेद सुरक्षा की बजाय असुरक्षा का कारण बन गया।


ऐतिहासिक संदर्भ

संविधान सभा की बहसें (1947–1950)

जब संविधान बन रहा था, तब कई सदस्यों ने सिख और जैन धर्म को स्वतंत्र मान्यता देने की मांग की थी।
लेकिन पंडित नेहरू और भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में बनी संविधान सभा ने यह निर्णय लिया कि —

  • हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध एक ही धार्मिक छतरी के नीचे आएँगे।
  • इसका उद्देश्य “राष्ट्रीय एकता” बताया गया।

परंतु वास्तविकता यह हुई कि इससे इन समुदायों की स्वतंत्र पहचान संविधान से ही छीन ली गई।


सिख समाज की आपत्ति

  • सिखों का मानना है कि वे एक स्वतंत्र धर्म हैं।
  • 1925 में ही सिख गुरुद्वारा अधिनियम पास हुआ था, जिसने गुरुद्वारों को स्वतंत्र धार्मिक संस्थान के रूप में मान्यता दी थी।
  • लेकिन आर्टिकल 25 में सिखों को हिंदू धर्म का अंग बताना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट है।

उदाहरण:

1980–90 के दशक में पंजाब में अलगाववाद की मांग का एक कारण यह भी था कि सिखों को संवैधानिक पहचान नहीं मिली।


जैन समाज की स्थिति

जैन धर्म को हमेशा से स्वतंत्र आस्था माना गया है।

  • महावीर स्वामी के उपदेश, अहिंसा का सिद्धांत और तीर्थंकर परंपरा इसे अलग बनाते हैं।
  • फिर भी 2005 तक भारत सरकार ने जैन धर्म को आधिकारिक रूप से “अल्पसंख्यक” नहीं माना।
    👉 यानी दशकों तक जैन समाज भी अपनी अलग पहचान को लेकर संघर्ष करता रहा।

हिंदू समाज की चुनौतियाँ

हिंदू समाज के लिए आर्टिकल 25 ने दो बड़ी समस्याएँ पैदा कीं:

  1. मंदिर नियंत्रण:
    सरकार मंदिरों की संपत्ति और दान का उपयोग अन्य कार्यों में करती है।
    सवाल: मस्जिदों और चर्चों की आय पर सरकार का कोई अधिकार क्यों नहीं?
  2. धर्मांतरण:
    आर्टिकल 25 धर्म प्रचार की स्वतंत्रता देता है।
    इसका नतीजा यह हुआ कि कई मिशनरी संगठन ग्रामीण और निर्धन इलाकों में सक्रिय होकर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराते रहे।

न्यायपालिका का रुख

भारतीय न्यायपालिका ने कई बार यह माना है कि —

  • सिख, जैन और बौद्ध धर्म “हिंदू धर्म से उत्पन्न माने जाते हैं।”
  • लेकिन धार्मिक आस्था के स्तर पर इनकी स्वतंत्र पहचान है।

👉 यानी अदालतें भी इस विषय पर स्पष्टता नहीं ला सकीं।


समाधान और हमारी मांगें

  1. आर्टिकल 25 की Explanation II को हटाया जाए।
    • सिख, जैन और बौद्ध धर्म को स्वतंत्र मान्यता मिले।
  2. मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए।
    • जैसे मस्जिद और चर्च स्वतंत्र हैं, वैसे ही मंदिर भी हों।
  3. धर्मांतरण पर सख्त कानून बने।
    • धर्म प्रचार की स्वतंत्रता का दुरुपयोग रोका जाए।

निष्कर्ष

आर्टिकल 25 का मूल उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता देना था।
लेकिन उसकी वर्तमान व्याख्या ने हिंदू, सिख और जैन समाज को बराबरी के अधिकारों से वंचित कर दिया।

सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल का मानना है कि संविधान की यह असमानता अब खत्म होनी चाहिए।
भारत का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब सभी धर्मों को सचमुच समान अधिकार और स्वतंत्रता मिले।

✍️ लेखक:
अशोक खत्री
प्रधान, सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल

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