भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता और समानता पर आधारित है। हर नागरिक को समान अधिकार मिलें, यही इसका मूल उद्देश्य है। लेकिन जब हम गहराई से अध्ययन करते हैं, तो कई अनुच्छेद ऐसे दिखाई देते हैं जो व्यवहार में असमानता पैदा करते हैं।
इन्हीं में से एक है आर्टिकल 28, जो सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा और उपासना को नियंत्रित करता है।
यह अनुच्छेद सुनने में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण लगता है, लेकिन जब हम इसके प्रभाव देखते हैं तो साफ पता चलता है कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू और सिख समाज को ही हुआ है।
आर्टिकल 28 क्या कहता है?
संविधान का अनुच्छेद 28 (Article 28 of the Indian Constitution) कहता है:
- किसी भी पूरी तरह से सरकार द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
- ऐसे संस्थानों में धार्मिक उपासना भी नहीं कराई जाएगी।
- लेकिन जिन संस्थानों को किसी धार्मिक ट्रस्ट या समुदाय द्वारा स्थापित किया गया है और जिन्हें सरकार केवल सहायता देती है, वहाँ धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है।
सतही तौर पर संदेश
इस अनुच्छेद का मक़सद था कि सरकारी संस्थान पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष बने रहें। यानी कोई भी छात्र किसी विशेष धर्म की शिक्षा लेने के लिए बाध्य न हो।
यह विचार सुनने में आकर्षक है, क्योंकि यह सबको समान दिखता है।
लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि यह अनुच्छेद वास्तव में हिंदू और सिख समाज पर असमान बोझ डालता है।
समस्या कहाँ है?
1. सरकारी स्कूलों से धार्मिक शिक्षा का निषेध
भारत में 80% से अधिक जनसंख्या हिंदू और सिख धर्म से जुड़ी है।
इन समुदायों की सबसे बड़ी ताक़त उनकी संस्कृति और परंपरा रही है।
लेकिन आर्टिकल 28 के कारण सरकारी स्कूलों में:
- न तो वेदों, उपनिषदों और गीता की शिक्षा दी जा सकती है।
- न ही सिख धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब का पाठ कराया जा सकता है।
👉 परिणाम:
नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कृति की जानकारी नहीं मिल पाती।
2. अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट
आर्टिकल 28(3) और आर्टिकल 30 के तहत:
- मदरसों में इस्लामी शिक्षा दी जाती है।
- मिशनरी स्कूलों में बाइबिल पढ़ाई जाती है।
- और इन संस्थानों को सरकार वित्तीय सहायता भी देती है।
लेकिन हिंदू और सिख समाज के लिए यह सुविधा नहीं है, क्योंकि उनके संस्थान “सरकारी” माने जाते हैं।
👉 यानी हिंदू और सिख बच्चों को उनके अपने धर्म की शिक्षा स्कूलों में नहीं मिलती, जबकि अन्य धर्मों के बच्चों को यह सुविधा पूरी तरह मिलती है।
3. संस्कृत शिक्षा की उपेक्षा
संस्कृत भारत की प्राचीनतम भाषा है और वेद-पुराणों की आधारभूत भाषा है।
लेकिन आर्टिकल 28 के कारण सरकारी स्कूलों में संस्कृत को केवल “वैकल्पिक विषय” के रूप में रखा गया।
👉 परिणाम: यह भाषा धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई।
4. राष्ट्रीय पहचान पर असर
भारत की संस्कृति और इतिहास का बड़ा हिस्सा सनातन और सिख परंपराओं से जुड़ा है।
अगर बच्चों को गीता, रामायण, वेद, उपनिषद या गुरुग्रंथ साहिब की मूल शिक्षा नहीं मिलेगी, तो उनकी राष्ट्रीय पहचान कमजोर होती जाएगी।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
संविधान सभा की बहस
1947–50 के दौरान जब संविधान पर चर्चा हो रही थी, तो कई सदस्यों ने सुझाव दिया था कि:
- भारतीय शिक्षा में धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य शामिल होने चाहिए।
- गीता, वेद, उपनिषद जैसे ग्रंथों का पाठ बच्चों को नैतिक शिक्षा के रूप में कराया जाना चाहिए।
लेकिन उस समय के नेताओं ने यह कहते हुए इन सुझावों को नकार दिया कि इससे “धर्मनिरपेक्षता” खतरे में पड़ जाएगी।
व्यवहारिक प्रभाव
मदरसे बनाम सरकारी स्कूल
- मदरसों को सरकार से अनुदान भी मिलता है और वे धार्मिक शिक्षा भी दे सकते हैं।
- वहीं सरकारी स्कूलों में हिंदू और सिख धर्म की शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध है।
👉 यह सीधा असमान व्यवहार है।
मिशनरी स्कूल
- मिशनरी स्कूलों में प्रार्थना, बाइबिल पाठ और धार्मिक गतिविधियाँ नियमित होती हैं।
- लेकिन अगर किसी सरकारी स्कूल में गीता पाठ या सरस्वती वंदना हो, तो उसे “धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन” कहा जाता है।
परिणाम
- हिंदू और सिख समाज के बच्चे अपनी संस्कृति से कट रहे हैं।
- जो शिक्षा उन्हें अपनी पहचान और गौरव सिखानी चाहिए थी, वह पूरी तरह गायब है।
समाज पर असर
- धार्मिक पहचान का संकट:
नई पीढ़ी को अपने धर्म और संस्कृति का ज्ञान न होने से उनकी पहचान कमजोर हो रही है। - असंतुलन:
एक ओर अन्य धर्मों को अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने की स्वतंत्रता है, वहीं हिंदू और सिखों के लिए यह रोक है। - सांस्कृतिक विघटन:
धीरे-धीरे भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं और मूल्यों से दूर होता जा रहा है।
हमारी माँगें
- आर्टिकल 28 की पुनर्व्याख्या की जाए।
- सरकारी स्कूलों में गीता, उपनिषद और गुरुग्रंथ साहिब जैसी ग्रंथों से नैतिक शिक्षा दी जाए।
- सरकारी स्कूलों में गीता, उपनिषद और गुरुग्रंथ साहिब जैसी ग्रंथों से नैतिक शिक्षा दी जाए।
- सभी धर्मों के लिए समान नियम हों।
- अगर मदरसे और मिशनरी स्कूल धार्मिक शिक्षा दे सकते हैं, तो हिंदू और सिख संस्थानों को भी यह अधिकार मिले।
- अगर मदरसे और मिशनरी स्कूल धार्मिक शिक्षा दे सकते हैं, तो हिंदू और सिख संस्थानों को भी यह अधिकार मिले।
- संस्कृत शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए।
- ताकि अगली पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ी रहे।
- ताकि अगली पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ी रहे।
- शिक्षा प्रणाली में संतुलन और न्याय सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
आर्टिकल 28 का मक़सद था धर्मनिरपेक्षता और समानता।
लेकिन व्यवहार में यह अनुच्छेद हिंदू और सिख समाज के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
जहाँ अन्य धर्म अपने बच्चों को स्वतंत्र रूप से धार्मिक शिक्षा दे पा रहे हैं, वहीं हिंदू और सिख समाज की आने वाली पीढ़ियाँ अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूर हो रही हैं।
सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल का मानना है कि संविधान में इस असमानता को दूर करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
समानता और न्याय तभी संभव होगा जब हिंदू और सिख बच्चों को भी स्कूलों में वही अधिकार मिले जो अन्य समुदायों को पहले से मिले हुए हैं।
✍️ लेखक:
अशोक खत्री
प्रधान, सनातन धर्म रक्षा दल, कैथल














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